Short observation about River, Water, Life and Complexities

 नदियाँ कितनी सुंदर होती है । हम देखते है उनका अविरल धारा से उत्पन्न मध्यम कल - कल स्वर, छिछलाते पानी के थपेड़ों की ठंडक बेहद उत्साहित करने वाली एवम् खूबसूरत होती है ।

Fig : Laxman Jhula

                एक नदी में चलते है अनेकों छोटे कंकड़, पत्थर से लेकर विशालकाय हिमखंड, चट्टानें आदि । लेकिन ये सब अंत तक साथ नहीं चलते, बस बीच घाटियों में कहीं स्थान पा लेते है, या तो तलहटी की गहराइयों में बैठ जाते हैं या किनारे की दलदली में भिन्न प्रकार की जड़ों में उलझकर जम जाते हैं। एक नदी अपने महान प्रवाह के साथ भी सब कुछ नहीं पा सकती, सब कुछ नहीं ले जा सकती, चाहकर भी। कुछ न कुछ पीछे छोड़ना ही रहता है, शायद यही प्रकृति है । छूटे हुए का शोक मनाना अर्थहीन है, वो वापस आने से रहा । क्या देखा है कभी नदियों के पानी को उल्टा बहते हुए ? किसी चट्टान, फूल, लकड़ी के साथ की चाह पानी को व्याकुल तो कर सकती है, परंतु इस पर नदी का रुख उलटा नहीं जा सकता।  पानी की प्रकृति है - अपने वेग से बहना । व्याकुलता को समेटे हुए भी आगे बढ़ते जाना, प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना तथा जीव जंतुओं के उपयोग में आना । 

        'तो उस व्याकुलता का क्या ?' यह प्रश्न मन में आना स्वाभाविक है यदि आप प्रस्तुत दशा समझ पाते हैं। वह कभी अलग नहीं हो सकती, पर उसे नियंत्रित किया जा सकता है, और करते ही हैं । 


       

'क्या और कोई उपाय नहीं है?' प्रयासों के पगो के आगे नामुमकिन तो कुछ भी नहीं, पर कुछ प्रयास सफल होने के मार्ग में प्रकृति के विपरीत जाना मांगते है जिसमें बहुत कुछ तबाह भी कर देते हैं, जो कि अंत में नुकसानदेह ही हैं। जब पानी की व्याकुलता की हदें पार होती हैं, तो वो यही प्रयास करता है उपाय पाने के लिए। वो अपनी मंद मंद निम्न स्तर प्रवाह की प्रकृति के विपरीत जाकर अपने साथ उन चट्टानों, मिट्टी आदि विषयों को समेट लाता हैं जिनका कभी साथ रहा था । यह अनियंत्रित व्याकुलता लाती है 'विनाश', जो असहनीय हैं, जो अप्राकृतिक हैं। अतः उपाय का प्रत्येक प्रयास अर्थपूर्ण नहीं हो सकता हैं ।

          ' फिर क्या चलता है नदी के साथ अंत तक ?'  एक विषय है जो प्रथम बूंद के बिंदु से लेकर महासागर में विलीन होने तक नदी का साथ नहीं छोड़ता - किनारे । आदि से अनंत तक नदी के साथ का विशेषाधिकार पाने की कीमत भी किनारों को चुकानी पड़ी होगी, अवश्य ही।  क्या रही होगी वो कीमत, शायद यही तो नहीं कि दो किनारे हमेशा साथ रहेंगे परंतु कभी एक नहीं हो पाएंगे। वो मिल पाएंगे अन्य सहायक नदियों के किनारों में पर स्वयं के किनारों का अस्तित्व अलग ही रहेगा। 

              नदियों के मिलने की सुंदर बात यही है कि वो एक होने की बात कहती हैं, अब तुम भी मिलो तो किसी नदी में एक नदी की तरह, जो मिलकर एक हो जाते हैं, हमेशा के लिए ।

Comments

  1. 🌼🌊 wonderfully put.
    Reminds me of the poem, " निरंतर चल रही हूं मैं "

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