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Short observation about River, Water, Life and Complexities

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 नदियाँ कितनी सुंदर होती है । हम देखते है उनका अविरल धारा से उत्पन्न मध्यम कल - कल स्वर, छिछलाते पानी के थपेड़ों की ठंडक बेहद उत्साहित करने वाली एवम् खूबसूरत होती है । Fig : Laxman Jhula                 एक नदी में चलते है अनेकों छोटे कंकड़, पत्थर से लेकर विशालकाय हिमखंड, चट्टानें आदि । लेकिन ये सब अंत तक साथ नहीं चलते, बस बीच घाटियों में कहीं स्थान पा लेते है, या तो तलहटी की गहराइयों में बैठ जाते हैं या किनारे की दलदली में भिन्न प्रकार की जड़ों में उलझकर जम जाते हैं। एक नदी अपने महान प्रवाह के साथ भी सब कुछ नहीं पा सकती, सब कुछ नहीं ले जा सकती, चाहकर भी। कुछ न कुछ पीछे छोड़ना ही रहता है, शायद यही प्रकृति है । छूटे हुए का शोक मनाना अर्थहीन है, वो वापस आने से रहा । क्या देखा है कभी नदियों के पानी को उल्टा बहते हुए ? किसी चट्टान, फूल, लकड़ी के साथ की चाह पानी को व्याकुल तो कर सकती है, परंतु इस पर नदी का रुख उलटा नहीं जा सकता।  पानी की प्रकृति है - अपने वेग से बहना । व्याकुलता को समेटे हुए भी आगे बढ़ते जाना, प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारिय...